पता नहीं

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है भी या नहीं,
बात यह अंजानी,
असमंजस में बहती नदियां,
कब ही समुन्दर में जा मिली,
यह पता ही नहीं…

हम बैठे थे इस इंतज़ार में,
कोई पूछे हमसे भी सही,
क्या बात हो गयी,
कोई लहर चल बसी?
पता ही नहीं!

विद्रोह की आग में,
अपने ही कर्म जला बैठे,
कब ही जीवन जल उठा,
कोई बताये तो!!
हमें पता ही नहीं!

कल थीँ आज नहीं,
अस्तियाँ उस लौह की,
जीवन जिसने किया रौशन,
आज कहाँ गयी,
पता ही नहीं।

अंतरमन में बसा वोह रवि,
कहता है कि आओ जला दूँ,
जीवन-मरण का रहसय बता दूँ,
जान कर भी क्या करूँ,
पता ही नहीं!

***

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